Diversity in Unity and Unity in Diversity is natural element of religion

केवल आदमी ही नही प्रतेक प्राणी के चिन्तन और चाहत मे भिन्नता और पूरी प्रक्रिती मे विशमता है , वैचारिक स्वतन्त्रता प्राकृतिक है । इसी लिये मानव समाज मे धर्म और सन्सकारो मे भिन्नताये है । इस् लिये पूरा संसार एक ही धार्मिक झन्डे के नीचे आ ही नही सकता है, रह ही नही सकता है और रहना भी नही चाहिये क्योकी यह तो अप्राकृतिक होगा। इश्वर एक है उसके नाम और रुप आदमियो ने अपनी चाहना के अनुसार निर्मित किये है और उस इश्वर तक पहुचने के लिये धर्म और सम्प्रदाय् बनाये गये है । इस लिये सभी धर्म अच्छे हैऔर एक ही मन्जिल तक पहुचने के लिये अलग अलग प्रक्रिती के आदमियो कि चाहना और सुविधा के अलग अलग रास्ते भर है । रास्ते के बारे मे विवाद करनआ मूर्खता होती है । विवाद से इश्वर की ओर जाने का रास्ता छूट जाता है और हम पशुत्व के रास्ते पर चले जाते है । धार्मिक विविधता समाज का अनिवार्य तत्व है । पर स्मर्णीय यह है कि धर्म की नीव सदाचार और सेवा पर टिकी होनी चाहिये । धर्म मे स्वार्थ और हिन्सा को कोइ स्थान नही होता है, अगर ऐसा कुछ है तो वह इश्वर कि ओर ले जाने का रास्ता नही हो सकता है। ऐसा रास्ता तो हमारी मन और इन्द्रियो के भोग लिप्सा कि उपज भर होती है । इज लिये जो जिस रास्ते पर जाना चाहे, उसे जाने दो। सभी लोग मिल्जुल कर रहो। एकता मे विविधता बनी रहने दो । कल्याण का यही रास्ता है ।यह धर्म का अङ है ।